जलवायु परिवर्तन: राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक उभरता हुआ खतरा (Climate Change: An Emerging Threat to National Security)
जलवायु परिवर्तन अब केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा भी बन गया है। बढ़ते तापमान, बदलते मौसम के पैटर्न और चरम मौसम की घटनाओं का दुनिया भर में देशों की सुरक्षा पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। यह खाद्य और जल सुरक्षा को खतरे में डाल रहा है, सामाजिक अशांति और संघर्ष को जन्म दे रहा है, और बड़े पैमाने पर विस्थापन पैदा कर रहा है।
![]() |
| जलवायु परिवर्तन |
जलवायु परिवर्तन राष्ट्रीय सुरक्षा को कैसे खतरा है:
- खाद्य और जल सुरक्षा: जलवायु परिवर्तन से सूखा, बाढ़ और अन्य चरम मौसम की घटनाएं हो सकती हैं जो फसलों को नुकसान पहुंचा सकती हैं, जल संसाधनों को कम कर सकती हैं, और खाद्य सुरक्षा को खतरे में डाल सकती हैं। यह सामाजिक अशांति और संघर्ष को जन्म दे सकता है, क्योंकि लोग भोजन और पानी के लिए संघर्ष करते हैं।
- सामाजिक अशांति और संघर्ष: जलवायु परिवर्तन से संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है, जैसे कि भूमि और पानी। यह सामाजिक तनाव और संघर्ष को जन्म दे सकता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां संसाधन पहले से ही दुर्लभ हैं।
- बड़े पैमाने पर विस्थापन: जलवायु परिवर्तन से समुद्र का स्तर बढ़ सकता है, तटीय क्षेत्रों में बाढ़ आ सकती है और लोगों को अपने घरों से विस्थापित कर सकती है। यह बड़े पैमाने पर प्रवास और विस्थापन पैदा कर सकता है, जिससे राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक अशांति हो सकती है।
- प्राकृतिक आपदाएं: जलवायु परिवर्तन से तूफान, बाढ़, सूखा और जंगल की आग जैसी प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता और आवृत्ति बढ़ सकती है। यह बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा सकता है, अर्थव्यवस्थाओं को बाधित कर सकता है और जानमाल का नुकसान कर सकता है।
भारत पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव:
भारत जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि यह एक उष्णकटिबंधीय देश है जिसकी आबादी घनी है और कृषि पर बहुत अधिक निर्भर करती है।
जलवायु परिवर्तन के कुछ संभावित प्रभावों में शामिल हैं:
- बढ़ते तापमान: भारत में तापमान पहले से ही बढ़ रहा है, और आने वाले दशकों में इसके और बढ़ने की उम्मीद है। यह गर्मी की लहरों, सूखे और अन्य चरम मौसम की घटनाओं की अधिक तीव्रता और आवृत्ति को जन्म दे सकता है।
- अप्रत्याशित वर्षा: भारत में वर्षा पैटर्न पहले से ही बदल रहे हैं, और आने वाले दशकों में और अधिक अप्रत्याशित होने की उम्मीद है। इससे बाढ़ और सूखे जैसी चरम मौसम की घटनाओं की अधिक संभावना हो सकती है।
- समुद्र का बढ़ता स्तर: समुद्र का स्तर पहले से ही बढ़ रहा है, और आने वाले दशकों में इसके और बढ़ने की उम्मीद है। यह भारत के तटीय क्षेत्रों में बाढ़ और कटाव का कारण बन सकता है, जिससे लाखों लोग विस्थापित हो सकते हैं।
भारत जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है। देश के बड़े हिस्से सूखे, बाढ़, और चक्रवातों जैसी चरम मौसम की घटनाओं से ग्रस्त हैं। जलवायु परिवर्तन हिमालय के ग्लेशियरों को पिघलाने और समुद्र के स्तर को बढ़ाने में भी योगदान दे रहा है, जिससे तटीय क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है।
इन खतरों के बावजूद, भारत जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए कदम उठा रहा है। भारत ने पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं और स्वच्छ ऊर्जा और ऊर्जा दक्षता में निवेश करने का वचन दिया है। देश ने राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन रणनीति भी तैयार की है, जिसका लक्ष्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होना है।

Climate Change: An Emerging Threat to National Security
जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए भारत द्वारा किए जा रहे प्रयास:
भारत जलवायु परिवर्तन के खतरे को गंभीरता से लेता है और इसका मुकाबला करने के लिए कई मोर्चों पर सक्रिय रूप से काम कर रहा है। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण पहलों पर प्रकाश डाला गया है:
1. राष्ट्रीय स्तर पर:
- राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन रणनीति: भारत ने 2015 में अपनी राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन रणनीति (एनएसीसीएस) तैयार की, जिसका लक्ष्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होना है। एनएसीसीएस में अक्षय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, वनीकरण, और जल संसाधन प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।
- पेरिस समझौता: भारत पेरिस समझौते का एक हस्ताक्षरकर्ता है, जो एक ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय समझौता है जिसका लक्ष्य वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करना और 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए प्रयास करना है। भारत ने 2030 तक अपनी गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता को 450 गीगावाट तक बढ़ाने और 2030 तक अपनी कुल बिजली क्षमता का 50% नवीकरणीय ऊर्जा से प्राप्त करने का वचन दिया है।
- भारत ऊर्जा दक्षता नीति: भारत सरकार ने 2017 में राष्ट्रीय ऊर्जा दक्षता नीति (एनईईपी) शुरू की, जिसका लक्ष्य 2030 तक ऊर्जा तीव्रता को 30% तक कम करना है। एनईईपी में विभिन्न क्षेत्रों में ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देने के लिए कई पहलें शामिल हैं, जैसे कि ऊर्जा-कुशल उपकरणों और प्रौद्योगिकियों को अपनाना, भवनों और औद्योगिक प्रक्रियाओं में ऊर्जा दक्षता में सुधार करना, और नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ाना।
2. क्षेत्रीय स्तर पर:
- जलवायु परिवर्तन पर राज्य कार्य योजनाएं: भारत के प्रत्येक राज्य ने अपनी जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (एसएसीसीपी) तैयार की है, जो एनएसीसीएस के अनुरूप है। एसएसीसीपी राज्य-विशिष्ट जलवायु परिवर्तन लक्ष्यों और रणनीतियों को निर्धारित करते हैं।
- स्मार्ट सिटी मिशन: भारत सरकार ने स्मार्ट सिटी मिशन शुरू किया है, जिसका लक्ष्य शहरी क्षेत्रों को अधिक टिकाऊ और जलवायु-अनुकूल बनाने के लिए है। इस मिशन के तहत, शहरों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बुनियादी ढांचे, जैसे कि सार्वजनिक परिवहन प्रणाली, ऊर्जा-कुशल भवन, और जल संरक्षण प्रणाली विकसित करने के लिए धन प्राप्त होता है।
3. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर:
- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन: भारत अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) का एक संस्थापक सदस्य है, जो एक अंतर सरकारी संगठन है जिसका लक्ष्य सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना है। आईएसए विकासशील देशों में सौर ऊर्जा परियोजनाओं को विकसित करने और वित्तपोषित करने में मदद करता है।
- मिश्रित वित्तपोषण सुविधा: भारत मिश्रित वित्तपोषण सुविधा (एमएफएफ) का एक संस्थापक सदस्य भी है, जो जलवायु परिवर्तन परियोजनाओं के लिए धन जुटाने के लिए एक वैश्विक पहल है। एमएफएफ सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों से धन जुटाता है और विकासशील देशों में जलवायु-अनुकूल परियोजनाओं का समर्थन करता है।
निष्कर्ष:
जलवायु परिवर्तन एक गंभीर खतरा है जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक प्रमुख चुनौती के रूप में देखा जाना चाहिए। इस खतरे का मुकाबला करने के लिए, देशों को मिलकर काम करना होगा और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। भारत जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, और यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकता है कि एक सुरक्षित और टिकाऊ भविष्य आने वाली पीढ़ियों के लिए उपलब्ध हो।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें